इथेनॉल-मिश्रित डीज़ल, डीज़ल के फ़्लैश पॉइंट से जुड़े मौजूदा सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं करता

हाइलाइट्स
- इथेनॉल मिलाने से डीज़ल का फ़्लैशपॉइंट कम हो जाता है
- तेल बनाने वाली कंपनियों ने मान्यता प्राप्त लैबोरेटरी और कार बनाने वाली कंपनियों के साथ मिलकर टेस्टिंग की
- डीज़ल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने पर अभी भी विचार चल रहा है
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने सोमवार को संसद को बताया कि सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों ने प्रयोगशालाओं और वाहन निर्माताओं के साथ मिलकर इथेनॉल-मिश्रित डीजल की टेस्टिंग की थी. नतीजों से पता चला कि यह ईंधन अभी डीजल के 'फ़्लैश पॉइंट' सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरता है, इसलिए निकट भविष्य में इसके इस्तेमाल की संभावना नहीं है.
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गोपी ने बताया कि इथेनॉल मिलाने से डीज़ल फ़्यूल मिक्स का फ़्लैश पॉइंट रेगुलर डीज़ल से कम हो जाता है. फ़्लैश पॉइंट टैस्टिंग एक ज़रूरी सेफ़्टी टेस्ट है, जिससे फ़्यूल मिक्स के जलने की क्षमता का पता लगाया जाता है. कम फ़्लैश पॉइंट वाले फ़्यूल को जलने के लिए कम पीक टेम्परेचर की ज़रूरत होती है और ज़्यादा फ़्लैश पॉइंट वाले फ़्यूल के लिए ज़्यादा टेम्परेचर की. हालाँकि टेस्ट की पूरी जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन डीज़ल-इथेनॉल मिक्स का फ़्लैश पॉइंट कम होने से ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज में बड़ी दिक्कतें आ सकती हैं, और अगर इसे मौजूदा डीज़ल इंजन में इस्तेमाल किया जाए तो समय से पहले जलने (प्रीमैच्योर कंबशन) की समस्या भी हो सकती है.

ये टेस्ट रिज़ल्ट ऐसे समय में आए हैं जब सरकार के मौजूदा पेट्रोल-इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम पर सवाल उठाए जा रहे हैं. भारत में E20 ब्लेंडेड पेट्रोल को 2025 से चरणों में पेश किया गया था, और 2026 की शुरुआत तक इसने रेगुलर पेट्रोल की जगह पूरी तरह से ले ली. इसके अलावा, सरकार ने इस साल की शुरुआत में E85 फ्लेक्स फ्यूल (जिसमें 85% इथेनॉल होता है) भी पेश किया था.
E20 पेट्रोल की आलोचना हो रही है. इसकी वजह है गाड़ियों को नुकसान पहुंचने और माइलेज कम होने की खबरें, साथ ही SIAM और ARAI जैसी सरकारी एजेंसियों की ओर से किए गए फ्यूल टेस्टिंग की रिपोर्ट का पब्लिक डोमेन में उपलब्ध न होना.

इथेनॉल के अलावा, डीज़ल फ़्यूल में आइसोब्यूटेनॉल के इस्तेमाल पर भी कुछ समय से विचार किया जा रहा है. आने वाले CAFE नॉर्म्स 2027 के लिए तैयार किए गए लेटेस्ट ड्राफ़्ट में ब्लेंडेड डीज़ल फ़्यूल की कैलकुलेशन के लिए 'कार्बन न्यूट्रैलिटी फ़ैक्टर' को शामिल किया गया था, हालांकि इसके लिए कोई वैल्यू नहीं बताई गई थी. पिछली रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार आने वाले समय में डीज़ल के साथ 15% आइसोब्यूटेनॉल मिलाने का लक्ष्य बना रही है, हालांकि अभी इसके लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है.
आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग पर टिप्पणी करते हुए गोपी ने कहा कि अभी देश भर के पंपों पर मिलने वाले डीज़ल में आइसोब्यूटेनॉल की कोई ब्लेंडिंग नहीं होती है.
PTI से मिली जानकारी के साथ
प्रतीकात्मक तस्वीर




























































