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81 साल और आगे का सफ़र – महिंद्रा की दिलचस्प और अनोखी कहानी

81 साल और आगे का सफ़र – महिंद्रा की दिलचस्प और अनोखी कहानी

साल 1945 की बात है. आज़ादी से पहले के भारत में स्टील का व्यापार करने वाली एक छोटी सी कंपनी थी जिसका नाम 'महिंद्रा एंड मोहम्मद' था. जैसा कि आप अंदाज़ा लगा सकते हैं, इसी से M&M का जन्म हुआ – वही कंपनी जिसे आज हम 'महिंद्रा एंड महिंद्रा' के नाम से जानते हैं. लेकिन यह सिर्फ़ नाम बदलने की कहानी नहीं है. इसने कारोबार को भी बदल दिया. स्टील के व्यापार से लेकर उसका इस्तेमाल करके गाड़ियाँ बनाने तक, कंपनी ने लगातार बदलावों से भरे एक सफ़र की शुरुआत की.

बदलाव ही वह चीज़ है जिसने कंपनी को ज़िंदा रखा. असल में, 21वीं सदी की शुरुआत में महिंद्रा ने खुद को सबसे ज़्यादा नए सिरे से ढाला. इसी बात ने इसे भारत के पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में एक खास तरह की SUV बनाने वाली कंपनी से बदलकर टॉप-3 की मज़बूत दावेदार बना दिया. लंबा इतिहास रखने वाली हर कंपनी की तरह, महिंद्रा ने भी उतार-चढ़ाव देखे हैं. इस पर शायद एक पूरी किताब लिखी जा सकती है, लेकिन आइए हम इसे आपके लिए कुछ शब्दों में समझाते हैं.

साल 1949-2000 – मज़बूत और काम की गाड़ियों का दौर

कंपनी बनने के चार साल बाद और आज़ाद भारत के दो साल बाद, नए नाम वाली 'महिंद्रा एंड महिंद्रा' ने मज़गाँव (जो तब साउथ बॉम्बे का हिस्सा था) में एक साधारण असेंबली लाइन से अपनी पहली कार निकाली. यहाँ कुछ महीनों में कुल 75 'विलीज CJ' (अमेरिका में फोर्ड से ली गई किट) बनाई गईं. अगर इसकी तुलना आज से करें, तो महिंद्रा अभी हर दिन लगभग 2,500 गाड़ियाँ बनाती है. अमेरिकी किट से बनी गाड़ियों का यह कॉन्ट्रैक्ट-मैन्युफैक्चरिंग का दौर, भारत को कुछ ऐसी मज़बूत ऑफ-रोड गाड़ियाँ दे गया जो लंबे समय तक चलीं – जैसे CJ 500, MM540 और बाद में महिंद्रा मेजर – जिनमें से कुछ आज भी सड़कों पर दौड़ती दिखती हैं. उन शुरुआती सालों में ही महिंद्रा एक ऐसी बात सीख रही थी जो आगे चलकर उसकी पहचान का मुख्य हिस्सा बन गई - भारत को ऐसी गाड़ियों की ज़रूरत थी जो भारत में ही बनी हों और भारत के लिए हों.

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चाहे आप यकीन करें या न करें, उस समय भी पेट्रोल बनाम डीज़ल का सवाल था. जहाँ पेट्रोल यात्री गाड़ियों के लिए एक लोकप्रिय ईंधन था, वहीं महिंद्रा ने यह समझने में बाकियों से बाज़ी मार ली कि भारतीय परिस्थितियों के लिए अलग तरह के समाधानों की ज़रूरत है. अपने बड़े ट्रैक्टर डिवीज़न के अनुभव का फ़ायदा उठाते हुए, कंपनी ने 1975 में अपनी SUV में डीज़ल इंजन लाने के लिए प्यूज़ो (Peugeot) के साथ साझेदारी की - एक ऐसा कदम जिसने दशकों तक ब्रांड और इस सेगमेंट की पहचान को पूरी तरह से बदल दिया. अपनी बेहतर क्षमता और टॉर्क, सब्सिडी वाली कीमतों और मज़बूती की वजह से डीज़ल SUV की पहचान बन गया.

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1990 के दशक तक, आधुनिक मशीनों वाली कुछ ग्लोबल कार कंपनियाँ भारत के खुले बाज़ार में आ चुकी थीं. महिंद्रा ने महसूस किया कि उसे ऐसी नई कारों की ज़रूरत है जो उनसे मुकाबला कर सकें. लेकिन किसी और की नकल करने के बजाय कंपनी ने यूटिलिटी गाड़ियों में अपनी मज़बूती पर ध्यान दिया. इसी दौरान महिंद्रा अरमाडा (1993) आई - जिसमें फैक्ट्री से लगा हुआ प्लास्टिक मोल्डेड डैशबोर्ड, एयर कंडीशनिंग और बाद में पावर स्टीयरिंग का विकल्प भी मिला. अरमाडा ने साबित कर दिया कि मज़बूत और दमदार क्षमता वाली गाड़ी भी रोज़मर्रा की सवारी भी बन सकती है.

एक नया फ़ॉर्मूला सामने आ रहा था - मज़बूती बनाए रखो, आराम जोड़ो और बदलते भारत के हिसाब से गाड़ी बनाओ.

साल 2001-2010 – आधुनिक इंजीनियरिंग के साथ नई शुरुआत

सदी की शुरुआत में, महिंद्रा अपनी खुद की देसी पहचान बनाने के लिए तैयार थी. इस दशक में कुछ ऐसे मॉडल आए जिन्हें आज भारतीय लोग बहुत खास मानते हैं. लेकिन इससे भी ज़रूरी बात यह थी कि इस दशक में महिंद्रा ने भारतीय ऑटोमोटिव बाज़ार के हिसाब से खुद को ढालने के बजाय, बाज़ार को अपनी शर्तों पर आकार देना शुरू किया.

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बोलेरो (2001): अरमाडा ग्रैंड की जगह लेने के लिए डिज़ाइन की गई बोलेरो तुरंत हिट हो गई, हालाँकि शुरुआत में लोगों ने इसका विरोध किया क्योंकि महिंद्रा ने अरमाडा का लोकप्रिय नाम हटा दिया था. लेकिन कुछ समय बाद इसका नाम भी लोगों को पसंद आने लगा. बोलेरो सिर्फ़ एक गाड़ी नहीं रही. यह भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन गई – गाँव की सड़कों से लेकर छोटे कारोबारों तक, परिवार की सवारी से लेकर हर जगह जाने की क्षमता. अपनी कभी न खराब होने वाली तकनीक और हर तरह के काम में आने वाली खूबी के लिए मशहूर, यह दो दशकों से भी ज़्यादा समय से महिंद्रा की कमर्शियल और ग्रामीण बाज़ार में मज़बूत पकड़ बनाए हुए है.

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स्कॉर्पियो (2002): एक बहुत अहम मोड़. पूरी तरह से कंपनी के अंदर ही लैडर-फ़्रेम चेसिस पर बनाई गई स्कॉर्पियो ने लोगों का दिल जीत लिया और महिंद्रा की किसी भी दूसरी गाड़ी के मुकाबले इसे बहुत ज़्यादा पसंद किया गया. समय के साथ, यह एक साधारण मैकेनिकल सेटअप वाली गाड़ी से बदलकर रिफ़ाइंड मल्टी-लिंक सस्पेंशन सिस्टम, स्मूथ टर्बो-डीज़ल इंजन (mHawk) और आधुनिक तकनीक वाली गाड़ी बन गई.

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Thar (2010): पिछली सदी के CJ मॉडल और Major की विरासत को आगे बढ़ाते हुए, सबसे पहली Thar ने ऑफ-रोड के शौकीनों के लिए अपनी असली पहचान बनाई और जब हमें लगा कि इसमें और कुछ नया नहीं हो सकता, तो Mahindra ने COVID के दौरान मिले खाली समय का फ़ायदा उठाकर 2020 Thar को पूरी तरह से नए सिरे से सोचा और बेहतर बनाया. इस बदलाव ने इस असली ऑफ-रोडर को मालिकों के लिए ऑन-रोड लाइफ़स्टाइल की एक शानदार गाड़ी बना दिया. इसके बाद पाँच दरवाज़ों वाली Thar Roxx आई, जिसमें ऑफ-रोड क्षमता के साथ-साथ परिवार के लिए ज़रूरी सुविधाएँ भी थीं – यानी सबके लिए एक कार. हाल ही में लॉन्च हुई

Thar OG के साथ, यह अब अपने सबसे लोकप्रिय रूप में मौजूद है. उनकी कहानी का यह हिस्सा शायद इस बात का सबसे साफ़ उदाहरण है कि कंपनी अपनी विरासत को आज के ज़माने के हिसाब से कैसे ढाल सकती है. Thar की खासियत को छोड़ा नहीं गया, बल्कि यह पता लगाया गया कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसका मज़ा कैसे ले सकते हैं.

मोनोकोक और ग्लोबल महत्वाकांक्षा

Mahindra का सफ़र सिर्फ़ मज़बूत लैडर फ़्रेम वाली गाड़ियों तक ही सीमित नहीं था. ज़्यादा लोगों तक पहुँचने के लिए, उसे उस क्षेत्र में भी आगे बढ़ना था जिससे वह पिछले दशक तक ज़्यादातर दूर रही थी – मोनोकोक क्रॉसओवर. तेज़ी से बदलते नए दौर में ये गाड़ियाँ पारंपरिक लैडर-ऑन-फ़्रेम SUV को कड़ी टक्कर दे रही थीं. Mahindra जानती थी कि यह एक नया और अनजान क्षेत्र है, लेकिन वह इसका हिस्सा न बनने का जोखिम नहीं उठा सकती थी.

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इसलिए, 2011 में बिल्कुल अलग तरह की Mahindra XUV 5OO आई. इसमें शानदार कर्व्स और प्रीमियम सेडान जैसी आधुनिक इन-कार सुविधाएँ थीं. इसने बेहतर माइलेज दिया और ऐसे खरीदारों को अपनी ओर आकर्षित किया जो पहले Mahindra के ग्राहक नहीं थे. यह एक अहम बदलाव था क्योंकि Mahindra सिर्फ़ यह नहीं सोच रही थी कि बेहतर SUV कैसे बनाई जाए. वह यह भी सोच रही थी कि उन लोगों के लिए SUV कैसे बनाई जाए जिन्होंने पहले कभी Mahindra के बारे में सोचा भी नहीं था.

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यह रफ़्तार फ़्लैगशिप XUV 7OO के साथ तेज़ी से बढ़ी, जिसने परफ़ॉर्मेंस, आराम और इन-कार कनेक्टिविटी के मामले में न सिर्फ़ Mahindra के लिए, बल्कि पूरी इंडस्ट्री के लिए नए नियम तय किए. 7XO के साथ, XUV की कहानी और आगे बढ़ी है.

प्रोडक्शन लाइनों से परे

हालांकि ऑटोमोबाइल बनाना उनके इतिहास का एक अहम हिस्सा था, लेकिन महिंद्रा ने बड़े ग्लोबल स्ट्रैटेजिक वेंचर्स (रणनीतिक साझेदारियों) पर भी काम किया.

फॉर्मूला E (2014–अब तक): पूरी तरह से इलेक्ट्रिक रेसिंग चैंपियनशिप में एक फाउंडिंग टीम के तौर पर, महिंद्रा ने मोटरस्पोर्ट का इस्तेमाल हाई-परफॉर्मेंस इलेक्ट्रिक पावरट्रेन के लिए एक बेहतरीन टेस्टिंग ग्राउंड के तौर पर किया. यह एक बहुत ही अलग तरह की प्रयोगशाला थी जहाँ मिलीसेकंड भी मायने रखते हैं, टेक्नोलॉजी को उसकी सीमाओं तक परखा जाता है और रेसट्रैक से मिले सबक आम सड़कों पर चलने वाली गाड़ियों के लिए काम आते हैं.

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पिनिनफेरिना (2015): मशहूर इटैलियन डिज़ाइन स्टूडियो को अपने साथ जोड़ते हुए, महिंद्रा ने बेहद खास 1800 bhp से ज़्यादा ताकत वाली पिनिनफेरिना बतिस्ता इलेक्ट्रिक हाइपरकार बनाने में मदद की. किसी भारतीय ऑटोमोटिव कंपनी के लिए, यह अपने इरादे ज़ाहिर करने जैसा भी था. महिंद्रा सिर्फ़ ग्लोबल ऑटोमोटिव इंडस्ट्री को बाहर से नहीं देख रही थी. वह इसका हिस्सा बन रही थी.

भविष्य का दरवाज़ा: इलेक्ट्रिक कारें

Mahindra Electric SU Vs Under Baa S Scheme

जैसे 70 के दशक में डीजल पर दांव लगाया था, वैसे ही महिंद्रा ने मौजूदा लहर से बहुत पहले ही इलेक्ट्रिक गाड़ियों की संभावना को भांप लिया. 2013 की e2O (पहले रेवा) ज़ीरो-एमिशन शहरी मोबिलिटी को अपनाने की एक शुरुआती कोशिश थी. अपने समय से थोड़ी आगे होने के बावजूद, इसने आने वाले दशक की बड़ी रणनीति की नींव रखी.

आज, वह सोच एक पूरे प्रोग्राम में बदल चुकी है. खास तौर पर बनाए गए प्लेटफॉर्म (INGLO) पर बनी BE 6, XEV 9e और तीन-रो वाली XEV 9S जैसी गाड़ियां भारतीय ऑटोमोटिव क्षमता के लिए एक बड़ी छलांग हैं. शानदार फीचर्स, बड़ी क्षमता वाली बैटरी (79kWh तक) और असल में 500km से ज़्यादा की रेंज के साथ, ये गाड़ियां ब्रांड को आधुनिक ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी में सबसे आगे रखती हैं.

इनकी अहमियत सिर्फ़ इनके आंकड़ों से कहीं ज़्यादा है. ये एक बड़े सवाल का जवाब हैं - क्या कोई भारतीय ऑटो कंपनी ऐसी कारें बना सकती है जो न सिर्फ़ ग्लोबल इंडस्ट्री में मुकाबला करने लायक हों, बल्कि उसमें सबसे आगे निकलने का दम भी रखती हों? इसका जवाब जानने का एकमात्र तरीका था इसे आज़माना. और कंपनी ने ऐसा किया. कामयाबी के साथ.

81 साल - एक पूरी तरह से भारतीय कहानी

बहुत कम ऑटोमोटिव कंपनियां को इतिहास इतना लंबा रहा है. लेकिन आठ दशक का लंबा समय बड़े-बड़े औद्योगिक नामों को भी विनम्र बना देता है. बदलावों के साथ चलना ही काफ़ी नहीं है, आपको कॉम्पिटिशन से एक कदम आगे रहना होता है, लेकिन मौजूदा ग्राहकों से बहुत दूर भी नहीं. कहना आसान है, करना मुश्किल.

शायद यही बात कंपनी की 81 साल की यात्रा को गाड़ियों से परे भी देखने लायक बनाती है. क्योंकि यह सिर्फ़ SUVs, फ़ैक्टरियों, इंजनों या इलेक्ट्रिक प्लेटफ़ॉर्म की कहानी नहीं है. यह एक ऐसी कंपनी की कहानी है जिसने स्टील के व्यापार से शुरुआत की, गाड़ियां बनाना सीखा और न सिर्फ़ भारत के लिए, बल्कि अब दुनिया के लिए भी गाड़ियां बनाना सीखा.

रास्ते में रुकावटें आईं, रास्ते बदले भी गए, और नए सिरे से शुरुआत भी हुई. कुछ दांव ऐसे थे जो समय से पहले लगाए गए, जिन्होंने खेल बदल दिया, और कुछ ऐसे भी थे जिनसे सबक मिला. लेकिन इन सबके बीच एक बात हमेशा एक जैसी रही - आगे की राह पर बढ़ने की इच्छा. इसी वजह से इस भारतीय ऑटोमोटिव दिग्गज का 81 साल का सफ़र कुछ खास और अनोखा लगता है. 2011 से उनका नारा रहा है 'राइज़' (आगे बढ़ना) और अब यह कहना गलत नहीं होगा कि वे इसे बदलकर 'रिज़िन' (आगे बढ़ चुके) कर सकते हैं.

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